Saturday, November 07, 2009

मेरे घर में उस बुढ़ापे के लिये कमरा नहीं

जनसता के वार्षिकी विशेषांक में मेरी एक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है। ग़ज़ल तो पुरानी है पर ये ख़बर अच्छी लग रही है।

ग़ज़ल एक बार फिर -

कहने को तो वो मुझे अपनी निशानी दे गया
मुझ से लेकर मुझको ही मेरी कहानी दे गया

जिसको अपना मान कर रोएँ कोई पहलू नहीं
कहने को सारा जहां दामन ज़ुबानी दे गया

मेरे घर में उस बुढ़ापे के लिए कमरा नहीं
वो जो इस घर के लिए सारी जवानी दे गया

आदमी को आदमी से जब भी लड़ना था कभी
वो ख़ुदा के नाम का क़िस्सा बयानी दे गया

हमने तो कुछ यूँ सुना था उम्र है ये प्यार की
नफ़रतों का दौर ये कैसी जवानी दे गया

उस के जाने पर भला रोएँ कभी क्यों जो मुझे
ज़िंदगी भर के लिए यादें सुहानी दे गया

याद है कल ’दोस्त’ हम तो हँसते-हँसते सोये थे
कौन आकर ख़्वाब में आँखों में पानी दे गया

Wednesday, November 04, 2009

क्या आप सत्तर के दशक में पैदा हुये हैं?

क्या आप ७० के दशक में पैदा हुये हैं? या ऐसा कहें कि ८०-९० के दशक में बड़े हो रहे थे...स्कूल जा रहे थे, कालेज जा (नहीं जा, बदले में फ़िल्म देखने) रहे थे?

तब तो -

- फ़ैंटम, मैंड्रेक, बहादुर (वो घोड़े पर...) आपके ड्रीम हीरो थे। आप अगर लड़की हैं, तो "प्रेत का विवाह" वाली कॉमिक (वेताल) कई बार पढ़ चुकी थीं। इसके अलावा, लोट-पोट, चंदामामा, चंपक, नंदन, चाचा चौधरी और साबू, मधुमुस्कान आपके प्रिय पत्रिकाओं में से हुआ करती थीं, और पढ़ाकुओं के लिये कम्पिटीशन सक्सेस रिव्युह

-अमर चित्रकथा दोस्तों से बदल बदल कर पढ़ना और उसकी सिरीज़ जमा करना आपके लिये गर्व की बात होती थी।

- कैमलिन ज्यामिती बाक्स और फ़्लोरा पेन्सिल आपको बर्थडे पर मिले होंगे।

-छुट्टी पर जाने का मतलब दादा-दादी या नाना नानी जी से मिलने जाना होता था।

-आइसक्रीम का मतलब आरेन्ज स्टिक या वनीला का कोन हुआ करता था। वाडीलाल, दिनशा आदि कुछ नये नाम आने लगे थे आइसक्रीम की दुनिया में।

-आपकी फ़ैमिली कार फ़ियट (या अम्बैसैडर) थी।

-उस गाड़ी में पर्दे लगे होते थे, सफ़ेद नेट के बने हुये, शायद मां के हाथों सीये हुये।

-शायद एक छोटा सा पंखा भी लगा हो गाड़ी मॆं।

-आप सर्कस देखने एक न एक बार तो ज़रूर गये होंगे जहाँ, झकमक कपड़ों में लड़कियाँ करतब दिखाती थीं, बौने जोकर बेसर पैर की बातें कर हँसाते थे और किसी बैट जैसी वस्तु से एक दूसरे के पीछे मारते थे।

-अगर आपके घर टी.वी. था तो चित्रहार के समय घर पर भीड़ जमा होना कोई नई बात नहीं थी। रविवार को शाम को दूरदर्शन पर सिनेमा और दोपहर को रीजनल मूवी (सबटाइटल्स के साथ) आप बड़े शौक़ से देखते थे। कृषिदर्शन क्यों दिखाते हैं आपको कभी समझ नहीं आया क्योंकि वो वक़्त आपको पढ़ाई करने के लिये बैठना पड़ता था । रविवार को सुबह दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत के वक़्त पूरे शहर में कर्फ़्यू लग जाता था।

-जे.बी रमन और सलमा सुलतान (बालों में गुलाब के फूल के साथ, बिना मुस्काये समाचार पढ़ते हुये) आपके घर के सदस्य बन बैठे थे। किसी नेता के देहांत हो जाने पर तीन दिन का शोक दूरदर्शन पर आपको बहुत पीड़ा देता था, जब सारे दिन बांसुरी और शास्त्रीय संगीत सुनना पड़ता था।

-इंदिरा गांधी का देहांत और राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन का टीवी पर उनकी अंतिम क्रिया पर दिखाया जाना, सीधा प्रसारण, घरों मॆं टीवी देखने वालों की भीड़, भूले नहीं होंगे आप।

-घर में मार्डर्न गजेट के नाम पर फ़्रिज, मिक्सी और टी.वी. हुआ करते थे।

-डिस्को दीवाने नाज़िया हसन के गानों के आप दीवाने थे।

-मां, पिताजी, स्कूल के टीचर से मार खाना कोई बड़ी बात नहीं थी।

-तस्वीरें खींचना/खिंचवाना बड़ी बात थी। ३६ फ़िल्मों वाले कैमेरा से या किसी स्टुडियो में जा कर परिवार सहित फ़ोटो खिंचवाई होगी आपने, जहाँ सभी सावधान की अवस्था में खड़े हों।

-थोड़े बड़े होने पर लड़कियाँ, मिल्स ऍन्ड बून्स पढ़ाई की किताबों के नीचे रख कर कभी तो पढ़ी होंगी।

-बिनाका/सिबाका गीत माला रेडियो पर सुनना....

यादें बहुत सी हैं...अभी बस इतना ही ...

(एक फ़ार्वर्डेड ईमेल से कई अंश लिये गये हैं, जिसने सचमुच पुराने दिन याद दिला दिये...)


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Sunday, October 25, 2009

ग़ज़ल- छोटी-छोटी सी ख़ुशियाँ हैं


बाबुल की कच्ची कलियाँ हैं
खुशियाँ रंगती फुलझड़ियाँ हैं

नई मिट्टी है मन सोंधा है
कटती-जुड़ती सी कड़ियाँ हैं

तेरा प्यार से गाल चिकुटना
छोटी-छोटी सी खुशियाँ हैं

बचपन के सपनों से अब तक
अम्मा की जगती अँखियाँ हैं

झकमक धूप जो आंगन खेले
थोड़े दिन की रंगरलियाँ हैं

रातों को तेरी यादों से
लुकछुप मिलती दो सखियाँ हैं

अब के इस मौसम में नन्हें
फूलों से महकी गलियाँ हैं

Tuesday, October 20, 2009

ग़ज़ल-मिलते ही मैं गले नहीं लगता

लोग मुझको कहें ख़राब तो क्या
और मैं अच्छा हुआ जनाब तो क्या

है ही क्या मुश्तेख़ाक से बढ़ कर
आदमी का है ये रुआब तो क्या

उम्र बीती उन आँखों को पढ़ते
इक पहेली सी है किताब तो क्या

मैं जो जुगनु हूँ गर तो क्या कम हूँ
कोई है गर जो आफ़ताब तो क्या

ज़िंदगी ही लुटा दी जिस के लिये
माँगता है वही हिसाब तो क्या

मिलते ही मैं गले नहीं लगता
फिर किसी को लगा खराब तो क्या

आ गया जो सलीका-ए-इश्क अब
’दोस्त’ मरकर मिला सवाब तो क्या


(फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन)
(२१२२ १२१२ २२)

Saturday, October 17, 2009

जब दीप जले आना

दीपावली की सुंदर शाम, कई सुंदर पल, घर में लक्ष्मी के आगमन की तैयारी, मन में खुशियों के मेले, कई आने वाले सुंदर पलों की कल्पना और भगवान से प्रार्थना कि सब ऐसा ही सुंदर चलता रहे, सबके लिये। इन्हीं भावनाओं के साथ स्वागत है दीवाली तुम्हारा- २००९।

अभी यहाँ दीवाली शुरु नहीं हुई है, मगर दीवाली की उमंगें, दोस्तों से मिलना-जुलना शुरु हो चुका है। दीवाली की शाम आज कुछ अलग सी कटेगी, पं. रविशंकर के सितारवादन के साथ। बेसब्री से इंतज़ार है।

मेरा एक पसंदीदा गीत-

Monday, October 12, 2009

आज कुछ माँगती हूँ प्रिय...


आज कुछ माँगती हूँ मैं
प्रिय क्या दे सकोगे तुम?


मौन का मौन में प्रत्युत्तर
अनछुये छुअन का अहसास
देर तक चुप्पी को बाँधे
खेलो अपने आसपास
क्या ऐसी सीमा में खुद को
प्रिय बांध सकोगे तुम?


आज कुछ माँगती हूँ प्रिय...


तुम्हारे इक छोटे से दुख
से जो मेरा मन भर आये
ढुलक पड़े आँखों से मोती
सीमा तोड़ कर बह जाये
ज़रा देर उँगली पर अपने
दे देना रुकने को जगह
उसे थोड़ी देर का आश्रय
प्रिय क्या दे सकोगे तुम?


आज कुछ मांगती हूँ प्रिय...

कभी जब देर तक तुम्हारी
आंखों में मैं रह पाऊँ
बोझिल से सपनों के भीड़
में धीरे से गुम हो जाऊँ
और किसी छोटे से स्वप्न
के पीछे जा कर छुप जाऊँ
ऐसे में बिन आहट के क्या
समय को लाँघ सकोगे तुम?


आज कुछ माँगती हूँ प्रिय..

Tuesday, October 06, 2009

लौ को अपने दीप पर कुछ प्राण का विश्वास तो हो


शमन के अंतिम चरण में आस थरथराती क्यों हो
लौ को अपने दीप पर कुछ प्राण का विश्वास तो हो

शांत हो जलती कभी तो संग स्पंदन के थिरकती
रात की स्याही से अपने रूप को रंग कर निखरती
देह जल कर भस्म हो उस ताप में, पर मन नहाये
अश्रु-जल की बूँद से वह पूर्ण सागर तक समाये

त्याग अंतर का अहं, हो पूर्ण अर्पण, प्यार वो हो

लौ को अपने दीप पर कुछ प्राण का विश्वास तो हो

अंग अंग सोना बना है गहन पीड़ा में संवर कर
प्रज्ज्वलित है मन किसी आनंद अजाने से निखर कर
बन जो बैठी प्रियतमा अब प्रेम बंधन कैसे छूटे
तृषित मन की कामना है मधु की हर बूँद लूटे

रस में डूबे इस दिवस की राह में कोई शाम क्यों हो

लौ को अपने दीप पर कुछ प्राण का विश्वास तो हो

है अचेतन मन, मगर हर क्षण में उसका ध्यान भी है
रोष है दिल में मगर विश्वास का इक स्थान भी है
देह के सब बंधनों को तोड़ कर कोई अलक्षित
आस की इक सूक्ष्म रेखा बाँधती होकर तरंगितAlign Centerपास हो या दूर हो उस साँस पर अधिकार वो हो
लौ को अपने दीप पर कुछ प्राण का विश्वास तो हो

(अमिताभ त्रिपाठी को धन्यवाद के साथ- इस कविता को अपनी पारखी नज़र देने के लिये)

Tuesday, September 29, 2009

बड़ी हैं सीमायें मगर...

ज़िंदगी गुम हो रही है
आधुनिकता ढो रही हैं

खिंच रहा है बेलगाम मन
चमचमाती खनक सुन कर
छिछले होते जा रहे
अनूभूति के गहरे समंदर
बन गया है आदमी अब
एक मन रहित सा पुर्ज़ा
भावनायें,प्रेम, विरह सब अट्ठहास सी कर रही हैं

हृदय स्वार्थी हो गया है
एकनिष्ठता मूर्खता है
मूल्य टूट कर बिलख रहे हैं
मां की पूजा असभ्यता है
बाप को सब से मिलाना
हो गया है शर्मनाक सा
नीति की बातें पुरानी जैसे लंगड़ा सी रही हैं

खिलखिलाते बच्चों के अब
हाथ में कटार होती
गोलियाँ अब बात-बात पे
बात के बदले में चलती
अटका है मन ठाठ-बाट के
चक्रव्युह में फ़ँसा हुआ सा
ज़िंदगी बस होड़ में खु़द को पछाड़े जा रही है

कई मुखौटों में छिपा है
आदमी का असली चेहरा
कई परत नीचे दबा
आदर्श का पुराना ढर्रा
बड़ी हैं सीमायें, मगर दिल
धीरे-धीरे सीमित हुआ है
आस्था मर्यादा की परिभाषायें अब बदल रही हैं

Sunday, September 27, 2009

डूब जायें बस...मुल्तानी काफ़ी- उस्ताद सलामत खां

मुल्तानी-काफ़ी राग सिन्धी भैरवी में उस्ताद सलामत खां की आवाज़ में - डूब जायें बस...

मुल्तानी काफ़ी एक तरह की गायकी है जिसमें सूफ़ी प्रभाव देखा जा सकता है। इसे सिन्ध और पंजाब में बहुत गाया जाता है। ये बहुधा पंजाबी या सिंधी भाषा में होती है। ये मुल्तानी काफ़ी ख्वाजा ग़ुलाम फ़रीद की लिखी हुई है।



Monday, September 21, 2009

इज़ दैट यू?

हर साल एक नया असाइन्मेंट होता है। इस साल भी, किंडर्गार्टन से कक्षा चौथी तक को म्यूज़िक, ड्रामा, आर्ट, आदि पढ़ाने की ज़िम्मेदारी। कभी इतने छोटे बच्चों को सम्हाला नहीं है, तो स्कूल के शुरु होते ही पहला सप्ताह रोज़ स्टाफ़रूम में रोना-धोना मचा रहता था मेरा। मेरे कॉलीग्स के बिना मैं क्या कर पाती, सच, शुरु से ले कर अब तक, हमेशा ही । तो सबने मुझे रिसोर्सेज़ पकड़ाये, सी.डी. दिये, कहा, "बच्चों को संगीत बहुत पसंद होता है। अगर देखो कि वे चंचल हो उठ रहे हैं तो बस सी.डी, चला देना, सब नाचने गाने लगेंगे और फिर शांत हो जायेंगे और तुम आगे पढ़ा सकोगी”। और बस इस मंत्र के चलते, स्कूल में रोज़ नाच-नाच कर बच्चों के साथ, घर आकर सीधे बिस्तर पर होती हूँ, खर्राटों के साथ।

एक सी.डी है जिग्गा जम्प नाम की...और बच्चों को वो ही सबसे पसंद है- उसमें टच योर हेड, टच योर शोल्डर, टच योर नी, और टच योर फ़ीट क्रमश: बढ़ते हुये लय के साथ कर कर के मैं तो आधी धराशायी हो चुकी होती हूँ, और बच्चे, "मिसेज़ चैटर्जी, कैन वी डू इट वन्स मोर?" की मीठी आवाज़ में अनुनय करते हैं, जिसका जवाब ," वाण्ट टु डू दिस अगैन? ओ.के... द लास्ट टाइम..." के अलावा देते नहीं बनता।

इस वीकेंड एक बंगाली शादी थी यहाँ। मुकुट-टोपोर के साथ वर-वधू, और ३ दिन लगातार की मस्ती, सजना धजना, और घूमना। इस चक्कर में इस वीकेंड खाना बनाना रह गया। तो आज स्कूल में लंच मक्डॉनल्ड से ही करना पड़ा। तो मक्डॉनल्ड से लौटते वक़्त, रास्ते में लाल ट्रैफ़िक सिग्नल पर रुकी हुई थी मैं। पास की गाड़ी में १७-१८ वर्षीय लड़कों का दल, खिड़की खुली हुई और पीछे सीट पर एक प्यारा कुत्ता। मुझे देख कर कुत्ता भौंकने लगा तो मैं उस से बात करने लगी, और बस अचानक ही उन लड़कों की हर्ष ध्वनि सुनाई दी," इज़ दैट यू, मिसेज़ चटर्जी? रिमेम्बर अस? टाउन सेन्टर स्कूल?" मैं हैरान-परेशां। वो बच्चे बड़े हो गये हैं, जिन्हें मैंने कक्षा सातवीं में पढ़ाया था। आज गाड़ी चलाते हुये, दाढ़ी मूँछ में, अपनी पुरानी टीचर से अचानक मिल कर फिर बच्चों जैसा ही उच्छास...
" गाइज़, आई कैंट बिलीव दिस...यू पीपल हैव ग्रोन अप सो मच..." इतना ही कह पाई, पहचान भी नहीं पाई सबको ठीक से, कि बस सिग्नल के हरे होते ही वो हाथ हिला कर अपनी दिशा में आगे बढ़ गये।

जाने कब ये किंडर्गार्टन के बच्चे भी देखते ही देखते बड़ॆ हो जायेंगे।आज से सालों बाद शायद ये भी कभी ज़िंदगी के किसी ट्रैफ़िक सिग्नल पर अचानक ही मिलेंगे, दो मिनट रुकेंगे और फिर हाथ हिला कर आगे बढ़ जायेंगे, अपनी मंज़िल की ओर...

Tuesday, September 01, 2009

ग़ज़ल- है फ़ासले तो बहुत पर मिली हैं राहें कहीं तो


गुज़र गया वो ज़माना, पड़ी हैं यादें कहीं तो
दबी हुई है कहानी, हैं दफ़्न लाशें कहीं तो

मैं जो ज़मीं पे हूँ ज़र्रा, है आसमां उसकी मंज़िल
हैं फ़ासले तो बहुत पर, मिली हैं राहें कहीं तो

किया करूँ मैं दिनो-रात उसकी बातें सभी से
मेरी भी यादों से महके किसी की रातें कहीं तो

मैं हँस रहा हूँ हमेशा कमी नहीं है किसी की
कोई बताता तो होगा उसे ये बातें कहीं तो


बढ़ा के ग़म ढूँढते हैं कहाँ-कहाँ ’दोस्त’ अब हम
चलो उतारे ये सामां, किसी से बाँटें कहीं तो

( इस गज़ल को लिखते वक़्त ६ शेर बने। एक जो शेर और बना वो कुछ यूँ है)-

दिखा रहा था वोजैसे मुझे नहीं जानता है
उसे नहीं याद कोई सुनी हों बातें कहीं तो


(मफ़ाइलुन फ़ाइलातुन ) x 2

Monday, August 31, 2009

ई-स्वामी - बधाई


कुछ दोस्त, कुछ रिश्ते यूँ ही राह में चलते-चलते बन जाते हैं। ई-स्वामी से कुछ ऐसे ही मुलाक़ात हुई थी आनलाइन। और राह में चलते-चलते कब हम दोनों इतने अच्छे मित्र बन गये, पता नहीं चला। कुछ एक जैसा ही बैक-ग्राउंड (मध्य प्रदेश से), कुछ एक जैसी सोच तो कुछ उल्टी सोच, कुछ दोनों का बेबाक (उसका मुँहफ़ट होना, मेरा बेबाक होना :-P) होना, कुछ मन का मेल...

ब्लॉग वर्ल्ड में अनाम रहने वाला ई-स्वामी अभी कुछ महीने पहले हमसे मिला। :-) एक टिपिकल देवर की तरह मेरे किचन में खूब मीन-मेख निकाले, कहा, भाभी, चाय तक बनानी नहीं आती, पता नहीं दादा कैसे झेलते हैं आपको। सो-कॉल्ड सही चाय बनानी सिखाई, और दादा के साथ गाड़ी और बीयर की बातें ले कर व्यस्त रहा। बिचारी भाभी सीन से गुल...(थोड़ा-बहुत एक अच्छे देवर की तरह दादा की डाँट से बचाया भी, मेरे सेल-फ़ोन स्कूल में छोड़ आने की बात उन्हें न बता कर, और फिर हर दो मिनट में धमकी दे कर- "बता दूँ?")।

आज ये पोस्ट एक ख़ास बात ऐलान करने के लिये कर रही हूँ- ई-स्वामी को कल दूसरे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है। परिवार वालों के बाद ये खबर सबसे पहले मुझे दी उसने (ऐसा कह्ता है वो, सच का पता नहीं)। बच्चे का नाम बच्चे के चाचा के छ: साल के बेटे ने विशिष्ट रखा है। मां और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं और ई-स्वामी बहुत खु़श। तुम्हें बहुत-बहुत बधाई ई-स्वामी।

Monday, August 24, 2009

शंकर दा

"शंकर दा नहीं रहे मुनिया।"
"ओह"
शंकरदा की उम्र हो चुकी थी। अभी-अभी मिल के आ रही हूँ उनसे चन्दननगर के इस बार के विज़िट के दौरान। शंकर दा मेरे पिताजी से दो-तीन साल बड़े थे। मेरे परदादा जी डाक्टर थे और प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लिया था उन्होंने। उनकी बाद में झेलम में पोस्टिंग थी। बाद में जब वो चन्दननगर में आ कर रहने लगे तो शंकर दा हमारे घर काम करने लगे। शंकर दा अपने भाई बहनों के साथ सामने ही एक मिट्टी की कुटिया में रहते थे। हमारे घर में उस वक़्त गायें हुआ करती थीं। गायों की देखरेख से ले कर घर आंगन बुहारने तक का काम शंकर दा ही करते थे। बाद में दादाजी और दादी जी और फिर आखिरी तक हमारे घर वो काम करते रहे।

कोरबा से हम जब चन्दननगर दादा जी के पास घूमने आते तो शंकर दा हमारी टाफ़ी लाने जैसी छोटी छोटी फ़रमाइशें पूरी करते। हमें सख़्त हिदायत थी कि शंकर दा को पूरा बड़ों का सम्मान मिलना चाहिये। दादी जी उन्हें बेटे जैसा ही प्यार करतीं।


मेरे दादाजी के गुज़र जाने के बाद, जब हम कोरबा से चन्दननगर रहने आ गये, तब पाया कि दादी जी शंकर दा पर शायद हमसे भी ज़्यादा निर्भर थीं अपनी छोटी-छोटी ज़रूरतों के लिये। शंकर दा सुबह-सुबह आ कर घर के खिड़की दरवाज़े खोलते, आंगन बुहारते, गायों को चारा डालते, धोने वाले कपड़े भिगोते और फिर सारे दिन ही कुछ न कुछ करते रहते। दादी पुराने ज़माने की थीं, बिल्कुल वक़्त पर खाना, चाय, सोना सब ठीक समय पर। हर काम के लिये दादी जी शंकर दा को ही कहतीं। ठीक चार बजे, वो शंकर दा को हाँक लगातीं- शंऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽकर....ओ शंऽऽऽऽऽऽऽऽकर...चाय पीने आ जा। और शंकर दा की तत्पर आवाज़, अपनी कुटिया से- " जाऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽईईईई..." हम कहते, अच्छा है जो शंकर दा का नाम शंकर है, दादी जी को काफ़ी पुण्य हो जाता है रोज़, इतने बार भगवान का नाम लेने से"।

मैं कभी भी बहुत इन्डिपेंडेंट नहीं रही, स्वभावत:। अभी भी हर काम के किये अगर बहुत ज़रूरी न हो, तो पति के साथ ही करती हूँ, चाहे वो कहीं जाना हो या कुछ लेना हो। तो उस वक़्त भी, अपनी कज़िन के घर जाने के लिये (कोई ८-१० मिनट चलने का रास्ता) मैं शंकर दा से कहती, "शंकर दा मेरे साथ चलिये, पहुँचा आइये"। शंकर दा मेरे साथ निकल चलते। पर शंकर दा अपनी चाल से और मैं अपनी तेज़ चाल से। तो होता ये कि शंकर दा मुझ से कई क़दम दूर और मैं दीदी के घर पहुँच भी जाती, एक तरह से भूल ही जाती कि शंकर दा साथ थे। और तब ५ मिनट बाद, बेल बजती, घर की, " मुनिया, तुम पहुँच गई न?" " हाँ शंकर दा, अब आप जाइये, दो घंटे बाद आ जायेंगे क्या फिर?"

बहुत सारी यादें जुड़ी हैं शंकर दा के साथ। इस बार जा कर सुना शंकर दा बीमार हैं। अभी भी वही कुटिया है उनकी। उन्होंने तो शादी नहीं की, भाई बहनों के परिवार में ही रहते थे। मैं उनसे मिलने गई। वो लेटे हुये थे, बिल्कुल बूढ़े हो चुके थे, अब तो काम भी नहीं करते थे कुछ सालों से। मैं उनके सिरहाने बैठी, सिर पर हाथ फेरा और उनकी तबीयत पूछी। डाक्टर हाई ब्लड प्रेशर बता रहे थे। उनकी आँखों में पानी था। "जँवाईबाबू कैसे हैं? तुम कैसी हो" ? ये सब पूछा। ज़्यादा क्या कर सकती थी मैं। यही बस कर सकते हैं हम हमेशा ही...बस कुछ पैसे ही दे कर आ गई। कहा, " शंकर दा, अगर आप बुरा न मानें तो आपको कुछ पैसे दे कर जा रही हूँ, आप को ज़रूरत होगी। आपको क्या खाने का मन है बताइये, मैं ला देती हूँ। " शंकर दा ने कहा," न बेटा बुरा क्या मानना, मां कुछ दे तो बेटा कभी इंकार करता है क्या" ।

मम्मी के आज फ़ोन पर ये खबर सुनाते ही सारी यादें और शंकर दा का बूढ़ा चेहरा बार-बार सामने आ रहा है। बस जीवन है...और फिर मृत्यु....अच्छी- बुरी बातें सब रह जाती हैं, और फिर नया कोई जीवन शुरु होता है। ये पोस्ट आज शंकर दा को श्रद्धांजलि।


Monday, August 17, 2009

यादें- क्या बात थी कि जो भी सुना अनसुना हुआ

पुरानी कई यादों को संजो कर ले आई हूँ इस बार भारत से। १८-१९ साल की उम्र में आकाशवाणी रायपुर से प्रसारित मेरी गाई ग़ज़लें पापा के पुराने टेप-रिकार्डर में मिली। साथ ही मिला एक पुराना पीला अख़बार। पापा ने कितने जतन से ये सब संभाल के रखा है।

उन ग़ज़लों में से एक ग़ज़ल यहाँ सहेज रही हूँ।



और साथ ही वो अखबार की क्लिप।

Wednesday, July 01, 2009

आई मां मैं सच, हाँ सच

आई मां मैं सच, हाँ सच

बादल की सफ़ेद गाड़ी में
पंख फैलाये हवा से बातें
गप-शप, नींद, पुराने क़िस्से
आती हूँ मां सच, हाँ सच

आम के पेड़ों से कहना, दो
आम रख लें बचा के अपने
बारिश से कहना कि मुनिया
आती है अब के हाँ सच

साजन पीछे तुम रो लेना
मैं हँसकर बलखा जाऊँगी
भैया तुम अब डाँट न देना
देखो माँ! अब सच, हाँ सच

नीलू पीयू संग बूड़ी-छू
गिल्ली-डंडा, ताश के पत्ते
गुड्डू बापोन आँख-मिचौली
हाय! अब ना होंगे मां सच

पर तेरी गोदी तो होगी
पापा के हिसाब की कॉपी
दोनों की मीठी तकरारें
आई मां मैं सच, हाँ सच।
(भारत यात्रा पर लंबी छुट्टी में जाने से पहले)

Sunday, June 28, 2009

पगली कूक-कूक चिल्लाये


भारत में जहाँ मानसून के लिये तरसा जा रहा है, बरसात कभी भी आ सकती है, वहीं यहाँ अभी-अभी गर्मी शुरु हुई है। ऐसे में भी, मगर कविता लिखते समय भारत की गर्मी की ही छवि सामने होती है।


गर्मी के दिन फिर से आये

सुबह सलोनी, दिन चढ़ते ही
बन चंडी आंखें दिखलाती
पीपल की छाया भी सड़कों
पर अपनी रहमत जतलाती
सन्नाटे की भाँग चढ़ा कर
पड़ी रही दोपहर नशे में
पागल से रूखे पत्ते ज्यों
पागल गलियाँ चक्कर खाये

गर्मी के दिन फिर से आये

नंगे बदन बर्फ़ के गोलों
में सनते बच्चे, कच्छे में
कोने खड़ा खोमचे वाला
मटका लिपटाता गमछे में
मल कर गर्मी सारे तन पर
लू को लिपटा कर अंगछे में
दो आने गिनता मिट्टी पर
फिर पड़ कर थोड़ा सुस्ताये

गर्मी के दिन फिर से आये

तेज़ हवा रेतीली आँधी
सांय सांय सा अंदर बाहर
खड़े हुए हैं आंखें मूँदे,
महल घरोंदे मुँह लटकाकर
और उधर लड़ घर वालों से
खेल रही जो डाल-डाल पर
खट्टे अंबुआ चख गलती से
पगली कूक-कूक चिल्लाये

गर्मी के दिन फिर से आये

ठेठ दुपहरी में ज्यों काली
स्याही छितर गई ऊपर से
श्वेत रूई के फ़ाहों जैसे
धब्बे बरस पड़े ओलों के
लगी बरसने खूब गरज कर
बड़ी-बड़ी बूंदे, सहसा ही
जलता दिन जलते अंगारे
उमड़ घुमड़ रोने लग जाये

गर्मी के दिन फिर से आये


Friday, June 26, 2009

कुछ यूँ ही


पूरी छाँव किसे मिलती थी। आधी-आधी बाँट कर, कभी उँगली के सिरे से बाँध कर, कभी उछाल कर, लपक कर, खेलते थे उस छाँव से हम तीनों। कभी तो किसी के हिस्से आती ही थी धूप और कभी जो भूले से भी मुझे मिल जाती धूप, तो बढ़ आते थे उनके हिस्से के टुकड़े-टुकड़े छाँव, मेरे हिस्से की धूप को अपनाने । मैं इतराती, मुँह चिढ़ाती धूप को और फिर खुद धूप बन थिरकती। ऐसे ही धूप-छाँव के खेल में एक दिन अपना हिस्सा संग ले मैं चली आई थी बादलों की नगरी में। बादलों के शहज़ादे ने मुझे दी थी एक बड़ी सी छाँव। धूप की तो हिम्मत भी नहीं थी कि आ कर मेरे छाँव में छेद कर के झाँके। मगर फिर भी वो धूप-छाँव के खेल मुझे बहुत अज़ीज़ थे, अज़ीज़ हैं। बस कुछ दिन और...धूप बन थिरकूँगी फिर एक बार...

(मेरे अज़ीज़ भाइयों के लिये- एक अर्से बाद जिनसे फिर मुलाक़ात होगी)

Monday, June 22, 2009

हाय! मैं बन-बन भटकी जाऊँ


मृगमरीचिका ये संसार
बीहड़ बन
सुख-दुख का जाल
हाय! मैं बन-बन भटकी जाऊँ

जीवन-जीवन दौड़ी भागी
कैसी पीड़ा ये मन लागी
फूल-फूल से बगिया-बगिया
इक आशा में इक ठुकराऊँ
रंग-बिरंग जीवन जंजाल
सखि! मैं जीवन अटकी जाऊँ

हाय! मैं बन-बन भटकी जाऊँ

आड़े तिरछे बुनकर आधे
कितने इंद्रधनुष मन काते
सुख-दुख दो हाथों में लेकर
माया डगरी चलती जाऊँ
ये नाते रिश्तों के जाल
सखि! मैं डोरी लिपटी जाऊँ

हाय! मैं बन-बन भटकी जाऊँ॥

रोती आँखें जीवन सूना
देखे कब मन जो है दूना
पिछले द्वारे मैल बहुत है
संग बटोर सब चलती जाऊँ
पा कर भी सब मन कंगाल
सखि! किस आस में भटकी जाऊँ

हाय मैं बन-बन भटकी जाऊँ॥

Tuesday, June 16, 2009

जो सब कुछ पाने बैठे हैं- ग़ज़ल


जाने क्या ठाने बैठे हैं
वो जो अदना से बैठे हैं

हमको अब जब होश नहीं वो
हद की बातें ले बैठे हैं

ख़ुद का इल्म नहीं है उनको
पर सब को जाने बैठे हैं

कुछ ऐसे हैं, चैन से उकता
के जो ग़म पाले बैठे हैं

जाने क्या कुछ खो दें अब वो
जो सब कुछ पाने बैठे हैं

भीगी इन पलकों पे जाने
कितने अफ़साने बैठे हैं

मेरी गज़लें जिक्र हैं उनका
लो! वो ये माने बैठे हैं

'दोस्त' अब उनको क्या परखें जो
ग़ैरों में जा के बैठे हैं

Wednesday, June 10, 2009

ग़ज़ल- बड़ी ऊँची हैं दीवारें


चलो खु़द को ज़माने से मिला दें अब
नया ये काम कर के ही दिखा दें अब

बड़ा अनजान लगता है शहर मेरा
बड़ी ऊँची है दीवारें, गिरा दें अब

हो दिल में आग पर लब पर तबस्सुम हो
उन्हें मिलने का ये फ़न भी सिखा दें अब

तुम्हें है चैन ना मुझको क़रार आये
रुका सैलाब इन आंखों से बहा दें अब

नुमाइश की हमें आदत नहीं पर हाँ
सिहर जाओ जो ज़ख्म अपने दिखा दें अब

बड़ी धुँधली सी बातें कह रही आँखें
चलो झीना ये पर्दा भी हटा दें अब

उन्हें अपने जो ग़म से हो ज़रा फ़ुर्सत
तो 'दोस्त' अपना भी दर्द उनको सुना दें अब
.
(बहरे हज़ज़ मुसद्दस सालिम)
मुफ़ाईलुन x३
ग़ज़ल पर इस बहर की अच्छी जानकारी के लिये- सुबीर जी के ब्लाग यहाँ जायें

Monday, June 08, 2009

टोरांटो और यू.के के कवियों/लेखकों के साहित्यिक आदानप्रदान की शाम


(पूरी ख़बर और तस्वीरों के लिये हिन्दी साहित्य सभा टोरांटो के ब्लाग पर जायें)।


टोरांटो के मिसिसागा शहर मॆं यू.के. से पधारे ८ कवि और कवियित्रियों के संग टोरांटो शहर के क्षेत्रीय कवि/कवियित्रियों ने मिल कर भाग लिया एक अंतरराष्ट्रीय मिलन संध्या में जिस दौरान सभी पधारे यू.के. के गीतांजलि बहुभाषीय सांस्कृतिक समुदाय के माननीय गण व टोरांटो के हिन्दी साहित्य सभा के सदस्यों ने न सिर्फ़ अपने कविता पठन से सबको मुग्ध किया बल्कि इस तरह के एक्सचेंज प्रोग्राम की सराहना भी की।

Friday, May 29, 2009

फ़र्क़- भाग २

इस विषय पर पहले इस लिंक पर कुछ तस्वीरें पोस्ट की थीं। आज एक बार फिर फ़र्क़

समय-समय का फ़र्क़ के अंतर्गत ही-

अक्तूबर में- सर्दी के लिये तैयार होते पेड़- एक दोपहर
सर्दी में ठिठुरते पेड़- जनवरी की एक दोपहर
गर्मी के आगमन पर वही रास्ते- स्वागत में हरियाली से नहाये हुये से पेड़

Thursday, May 28, 2009

चूज़ों के जन्मने का जश्न

आज ६ चूजों ने जन्म लिया, मिस डान लोच की कक्षा में। बच्चे अतिउत्साहित थे। वे लगातार पिछले २१ दिन से हर अंडे को रोज़ ध्यान से देख रहे थे। हम भी सब जा-जाकर देख आते थे उन अंडों को। अभी कक्षा पहली के बच्चे लाइफ़-साइकल पढ़ रहे हैं,जिसके अंतर्गत बच्चों ने ये प्रोजेक्ट किया। इन्क्यूबेटर में ये अंडे २१ दिन तक रहे और जब ये चूज़े थोड़े बड़े हो जायेंगे तो इन्हें फ़ार्म में वापस दे दिया जायेगा, जहाँ से ये अंडे और इन्क्यूबेटर लाया गया है। फिर तो उन चूज़ों की नियति का पता है। वैसे बच्चों को बताया जाता है कि ये चू़ज़े अब वहाँ जा कर खेलेंगे, खुश रहेंगे, बड़े हो कर क्या होगा ये कोई पूछता नहीं न हम बताते हैं।







मिसेज़ बैटल की कक्षा पहली में एक पालतू गिनी पिग है। उसका नाम लूसी है और बच्चे बड़े प्यार से उसे खाना खिलाते हैं, देखभाल करते हैं। उसकी तस्वीर-



Friday, May 22, 2009

बच्चों को जवाब देने को बाध्य न करें कक्षा में



अक्सर देखा गया है कि कई बार कक्षा में बच्चे किसी भी सवाल का जवाब देने से घबराते हैं और जवाब नहीं देते। शायद बच्चा किसी सवाल का जवाब जानता भी हो, तो भी सबके सामने घबराता हो। ऐसे में क्या किया जाये। आइये जानते हैं कुछ छोटे-छोटे गुर।

(वैसे हम सभी शिक्षक इन गुरों को जानते हैं व अपनाते हैं, मगर आज एक बार फिर):

१) बहुत ज़रूरी है कि कक्षा में वातावरण बहुत ही comfortable हो। बहुत ज़रूरी है कि बच्चे को ये अहसास हो कि उसका जवाब गलत होने पर भी उसे अपमानित नहीं होना पड़ेगा, पूरी कक्षा के सामने।

२) कक्षा में शुरु से ही शिक्षक अपने कक्षा के नियमों में ये शामिल रखे कि किसी भी बच्चे का किसी दूसरे बच्चे को नीचा दिखाना मान्य नहीं है। ऐसे कुछ पोस्टर कक्षा में लगाये जा सकते हैं जिसमें ये बातें लिखी हों और बार-बार कक्षा में दोहराई जायें।

३) अगर बच्चा जवाब देने से हिचकिचाता है तो उसे एक दो ’हिन्ट’ दिये जा सकते हैं। अगर वो फिर भी जवाब देने से घबराता है तो वो अपने पास के विद्यार्थी से अपने जवाब को verify (सत्यापित) सकता है, और अपने सहपाठी से पूछ कर (after discussing it with a partner) थोड़ी देर बाद बता सकता है।
सबसे अच्छा तरीका है कि सवालों को पूछने से पहले १०-१५ मिनट का समय दिया जाये कि बच्चे ग्रूप बना कर इन प्रश्नों को discuss कर लें। इसमें कोई हानि नहीं है, क्योंकि हमारा उद्देश्य बच्चे के सीखने से है, न कि वो किस से या कैसे सीखता है।

४) कभी भी बच्चे को उसके जवाब के ग़लत होने पर डाँटिये नहीं। सबके सामने तो कतई नहीं। अगर आप को लगता है कि बच्चा पढ़ाई से कतराता है, तो यक़ीन जानिये, डाँटने से वो पढ़ाई नहीं करने लग जायेगा, न ही परीक्षा में आये कम अंकों को देख कर। ज़रूरी है कि वो बच्चा प्रोत्साहित हो। उसके लिये नाना उपाय हैं। ज़रूरी है उसे सिर्फ़," वाह! अच्छा जवाब है" कह कर ही छोड़ न दिया जाये बल्कि, ये कहा जाये कि " वाह! अच्छा जवाब। मुझे ये बहुत अच्छा लगा जब तुमने कहा कि....फ़लां फ़लां। अगर तुम ये भी बताते कि....फ़लां फ़लां...तो तुम्हारा जवाब और अच्छा होता।" इस तरह बच्चे को न सिर्फ़ प्रोत्साहन मिलेगा बल्कि उसे ये भी पता होगा कि आप उसके जवाब में और क्या आशा करते हैं, जिससे उसे अच्छे अंक प्राप्त हों। अगर जवाब ठीक नहीं तो उसे किसी दूसरे बच्चे के सही जवाब को सुनने के बाद फिर से मौक़ा दिया जाये।


५) बच्चे को "right to pass" या " जवाब न देने का अधिकार भी हो। अगर उसे कोई जवाब नहीं आता है तो उसे पूरी कक्षा के सामने जवाब देने को बाध्य न कर के जवाब न देने के अधिकार का उपयोग करने का मौक़ा दें। हाँ, इस अधिकार का प्रयोग बच्चे को एक नियम के अनुसार करने दिया जाये, शायद कुछ ऐसा कि सारे दिन में सिर्फ़ तीन बार ही वो इस अधिकार का उपयोग कर सकेगा जिससे वो इस अधिकार का समझबूझ कर प्रयोग करे।


६) कक्षा में अक्सर ही ग्रूप में गतिविधियाँ हों। वरना बच्चे एक दूसरे से सीखने और सहभागिता, सहयोगिता का गुण कभी भी सीख नहीं पायेंगे। वहीं, शिक्षक को कक्षा में नियमों का रखना भी ज़रूरी है।

आज बस इतना ही। कभी और कुछ और कक्षा में अनुशासन के बारे में।

एक बहुत अच्छा कार्यक्रम है जिसे कक्षा में अपनाया जा सकता है, बहुत ही कारगर जिसे कहते हैं TRIBES. भारत में अभी पता नहीं शिक्षकों के लिये इस कोर्स को करने की सुविधायें उपलब्ध हैं या नहीं, मगर इस कोर्स को लेने के बाद, मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला और कुछ बेहद कारगर उपाय जाने जिन्हें अपना कर कक्षा में एक बेहतर तरीके से अनुशासन को लागु किया जा सकता है। http://www.tribes.com/

Thursday, May 21, 2009

बदलाव -बस यूँ ही

बदलाव ज़िंदगी का एक तरीका है। तरीका ख़ुद-ब-ख़ुद उलझ जाने का और उलझ कर फिर खू़बसूरती से सुलझ जाने का। हर उलझाव के साथ खुलते हैं कुछ गिरह और हर सुलझाव ले आता है एक सवाल। जवाब के इंतज़ार में एक लंबे ख़ामोश पल के बाद पीछे दरवाज़ा बंद होता है। और फिर खुलता है एक नियम और हम बंध जाते हैं उस नये नियम में।

हाँ, ये भी ज़िंदगी का एक तरीका है...

जगजीत सिंह की आवाज़ का जादू...

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जीवन क्या है, चलता फिरता एक खिलौना है
दो आँखों में एक से हँसना एक से रोना है

चलते चलते राह में यूँ ही रस्ता मुड़ जाता है
अनजाने में अनजाने से रिश्ता जुड़ जाता है
किसे पता है किस रस्ते में कब क्या होना है

बीत गया जो वो हर पल आगे क्यों चलता है
राख हुये अंगारे कब के फिर भी दिल जलता है
भूली बिसरी यादों को अश्कों से धोना है

जो जी चाहे वो मिल जाये कब ऐसा होता है
हर जीवन जीवन जीने का समझौता होता है
अब तक जो होता आया है वो ही होना है

रात अंधेरी भोर सुनहरी यही ज़माना है
हर चादर में सुख का ताना दुख का बाना है
आती सांस को पाना जाती साँस को खोना है