ग़ज़ल एक बार फिर -
जिसको अपना मान कर रोएँ कोई पहलू नहीं
मेरे घर में उस बुढ़ापे के लिए कमरा नहीं
आदमी को आदमी से जब भी लड़ना था कभी
उस के जाने पर भला रोएँ कभी क्यों जो मुझे
कौन आकर ख़्वाब में आँखों में पानी दे गया
आज कुछ माँगती हूँ मैं
प्रिय क्या दे सकोगे तुम?
मौन का मौन में प्रत्युत्तर
अनछुये छुअन का अहसास
देर तक चुप्पी को बाँधे
खेलो अपने आसपास
क्या ऐसी सीमा में खुद को
प्रिय बांध सकोगे तुम?
आज कुछ माँगती हूँ प्रिय...
तुम्हारे इक छोटे से दुख
से जो मेरा मन भर आये
ढुलक पड़े आँखों से मोती
सीमा तोड़ कर बह जाये
ज़रा देर उँगली पर अपने
दे देना रुकने को जगह
उसे थोड़ी देर का आश्रय
प्रिय क्या दे सकोगे तुम?
आज कुछ मांगती हूँ प्रिय...
कभी जब देर तक तुम्हारी
आंखों में मैं न रह पाऊँ
बोझिल से सपनों के भीड़
में धीरे से गुम हो जाऊँ
और किसी छोटे से स्वप्न
के पीछे जा कर छुप जाऊँ
ऐसे में बिन आहट के क्या
समय को लाँघ सकोगे तुम?
आज कुछ माँगती हूँ प्रिय..

पास हो या दूर हो उस साँस पर अधिकार वो हो






आज ६ चूजों ने जन्म लिया, मिस डान लोच की कक्षा में। बच्चे अ
तिउत्साहित थे। वे लगातार पिछले २१ दिन से हर अंडे को रोज़ ध्यान से देख रहे थे। हम भी सब जा-जाकर देख आते थे उन अंडों को। अभी कक्षा पहली के बच्चे ला
इफ़-साइकल पढ़ रहे हैं,जिसके अंतर्गत बच्चों ने ये प्रोजेक्ट किया। इन्क्यूबेटर में ये अंडे २१ दिन तक रहे और जब ये चूज़े थोड़े बड़े हो जायेंगे तो इन्हें फ़ार्म में वापस दे दिया जायेगा, जहाँ से ये अंडे और इन्क्यूबेटर लाया गया है। फिर तो उन चूज़ों की नियति का पता है। वैसे बच्चों को बताया
जाता है कि ये चू़ज़े अब वहाँ जा कर खेलेंगे, खुश रहेंगे, बड़े हो कर क्या होगा ये कोई पूछता नहीं न हम बताते हैं।

बदलाव ज़िंदगी का एक तरीका है। तरीका ख़ुद-ब-ख़ुद उलझ जाने का और उलझ कर फिर खू़बसूरती से सुलझ जाने का। हर उलझाव के साथ खुलते हैं कुछ गिरह और हर सुलझाव ले आता है एक सवाल। जवाब के इंतज़ार में एक लंबे ख़ामोश पल के बाद पीछे दरवाज़ा बंद होता है। और फिर खुलता है एक नियम और हम बंध जाते हैं उस नये नियम में।
हाँ, ये भी ज़िंदगी का एक तरीका है...
जगजीत सिंह की आवाज़ का जादू...
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जीवन क्या है, चलता फिरता एक खिलौना है
दो आँखों में एक से हँसना एक से रोना है
चलते चलते राह में यूँ ही रस्ता मुड़ जाता है
अनजाने में अनजाने से रिश्ता जुड़ जाता है
किसे पता है किस रस्ते में कब क्या होना है
बीत गया जो वो हर पल आगे क्यों चलता है
राख हुये अंगारे कब के फिर भी दिल जलता है
भूली बिसरी यादों को अश्कों से धोना है
जो जी चाहे वो मिल जाये कब ऐसा होता है
हर जीवन जीवन जीने का समझौता होता है
अब तक जो होता आया है वो ही होना है
रात अंधेरी भोर सुनहरी यही ज़माना है
हर चादर में सुख का ताना दुख का बाना है
आती सांस को पाना जाती साँस को खोना है